समाज
अपने दम पर भी कुछ बाजार बनाना पडता है,
सबसे मिलजुलकर ही ब्यापार बनाना पड़ता है।
धीरे से शुरू करके फिर रफ्तार बनाना पड़ता है,
चलने के लिए हर वर्ग से ब्यवहार बनाना पड़ता है।
मेहनत से रंग भरकर सपनो को साकार बनाना पड़ता है,
ऊँगली ना उठाएं कोई भी ऐसा फनकार बनाना पड़ता है।
कोई तोड़ न सके बदनामी से ऐसा दिवार बनाना पड़ता है,
भरोसा हर बार करे ऐसा प्यार बनाना पड़ता है।
धर्म कहता है गैरो का जिवन भी गुलज़ार बनाना पड़ता है,
हालातो से लडकर खुद को तैयार बनाना पड़ता है।
Written by Adarsh Pathak
🖋️ कविता का भावार्थ यह कविता हमें सिखाती है कि जीवन में सफलता पाने के लिए स्वावलंबन और सहयोग दोनों जरूरी हैं। शुरुआत भले ही छोटी हो, लेकिन निरंतर प्रयास और सही व्यवहार से हम अपनी पहचान बना सकते हैं। कवि यह भी संदेश देता है कि मेहनत से न केवल अपने सपनों को साकार किया जा सकता है, बल्कि ऐसा चरित्र भी बनाया जा सकता है जिस पर कोई उँगली न उठा सके। बदनामी से बचने के लिए विश्वास की दीवार खड़ी करनी होती है और प्रेम ऐसा होना चाहिए जिस पर हर बार भरोसा किया जा सके। अंत में, कविता धर्म और इंसानियत की बात करती है—कि दूसरों के जीवन को भी सुंदर बनाना हमारा कर्तव्य है और परिस्थितियों से लड़कर खुद को हर हाल में तैयार करना ही असली जीत है।
कभी-कभी ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि सिर्फ सपने देखना ही काफी नहीं होता, उन्हें पूरा करने के लिए खुद का रास्ता भी बनाना पड़ता है। यह कविता आत्मनिर्भरता, मेहनत, भरोसे और इंसानियत की गहराई को दर्शाती है।
🌸 क्यों खास है यह रचना? आत्मनिर्भरता और मेहनत का संदेश जीवन और व्यापार दोनों से जुड़ा दर्शन सकारात्मक सोच और मानवीय मूल्यों की झलक हर वर्ग के पाठकों से जुड़ने वाली भावना
Sayonika’s Gallery पर ऐसी ही भावनात्मक, प्रेरणादायक और सच्चाई से जुड़ी रचनाएँ पढ़ते रहें।
written by _ Adarsh Pathak — प्रस्तुतकर्ता: Sayonika's Gallery & Team

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